Thursday, April 14, 2011

आज मैं हूँ - कल राख - फिर धुँआ हो जाऊँगा


आज  मैं  हूँ  - कल  राख  - फिर धुँआ  हो  जाऊँगा 


हर  रोज़  हर  लम्हा  कुछ और  मरता जाऊँगा 


ज़िन्दग़ी  है  ज़िन्दग़ी  है  चार पल  की  सिर्फ इतनी 


तुम कहो  या  न कहो तुम  - मैं  तो  ढलता  जाऊँगा 


हाथ  से सुर्ख  रेत  जैसा  - मैं फिसलता  जाऊँगा 


आज  मैं  हूँ  - कल  राख  - फिर धुँआ  हो  जाऊँगा 

1 comment:

Ashutosh Kumar Jha said...

Superb....!!