मैं यहाँ होकर भी गुम हूं किसी ओर ही दुनिया में
बैठे बैठे डूबी हूं , कई बेतुके से सवालों में
हूं यहाँ , मगर फिर भी एक अलग सी दुनिया का बसेरा है
अँधेरे में हूं शायद , या फिर किसी ओर ही दुनिया का सवेरा है
रुकी सी हूं कब से , फिर भी भटकते रहती है आरज़ू मेरी
ज़रा थाम ले मुझे , मैं भटकती न रह जाऊं इन दिनों रातों के फेरो में
1 comment:
Very nice lines
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