Monday, April 18, 2022

mountain

तू अनंत काल से अडिग यहाँ खड़ा 

मैं क्षण बर आके तुझे देखता हूँ


तू भूत भविष्य से परे 

मैं नश्वर - जलते हे बुझाने को बना हूँ



तू मेरे मरण के बाद भी यहाँ सिथिर रहेगा

और मैं कई जन्मों कई रूपों में तेरा दर्शन कर

तुजे अपने अनश्वर होने का प्रमाण दूंगा



तेरा भाग्य सिथिर होक जीवन दर्शन करना

और मेरा घूम घूम कर

Friday, November 16, 2018

Good night

Bas hui aaj ki
Kuch kal uthke fir ladenge
Kuch bujh ke fir jal uthenge 
Kuch Sapne fir jhilmilaynge 
Aur aankhen fir timtimmayengi 
Kuch Ronak Nai hogi kuch 
Aur naya din alag sa hoga

Abhi neend ka basera hai
Aakar muje Greera hai
Sabh aake Ankhon Main Ruka sa padha hai
Sach hai ki Sapna kuch Dhumil sa padha hai
Abhi raat ka dera hai
Kal Subha Naye din ka fera hai



Sunday, January 14, 2018

मैं भटकती न रह जाऊं यह दिन रात के फेरो में




मैं यहाँ होकर भी गुम हूं किसी ओर ही दुनिया में
बैठे बैठे डूबी हूं , कई बेतुके से सवालों में

हूं यहाँ , मगर फिर भी एक अलग सी दुनिया का बसेरा है
अँधेरे में हूं शायद , या फिर किसी ओर ही दुनिया का सवेरा है

रुकी सी हूं कब से , फिर भी भटकते रहती है आरज़ू मेरी
ज़रा थाम ले मुझे , मैं भटकती न रह जाऊं इन दिनों रातों के फेरो में




Sunday, November 12, 2017



इक इक कर छूटे सब ही 
कुछ ओर अंधेरे लगते है 
मैं तुम मैं - तु मुझ मैं बस जा 
फिर नये सवेरे  लगते है 

रात का दिन से रिश्ता पुराना 
रोज़ के फेरे लगते है 
दो पल ठेरो तुम भी अभ तो 
यहां सालों ठहरे लगते है 


Friday, September 15, 2017

tum itna khoob bolo kese likh jate ho



tum itna khoob bolo kese likh jate ho
teekha lage par meethi si seekh chod jate ho
lafzo ke tane bano se kese khel jate ho
anjane main bhi dil main kuch tees jate ho


shabdho ke samunderon main kese ter jate ho
teerte ho ya fir kuch aur andher doob jate ho
has bhi dete ho kabhi anson bahate ho
dil ke darvazo ke tale khol jate ho

roh ke  janjhalon ko aur uljaye jate ho
uljye padhe dil ko fir kabhi sehlaye jate ho
tum itna khoob bolo kese likh jate ho
teekha lage par meethi si seekh chod jate ho

Thursday, March 09, 2017

मैं जब चुपके से कोने मैं , एक लम्हे मैं खोई हूं 
हर एक पल अचानक से , कुछ थमता सा लगता है 

ना आगे की कोई परवाह है , ना पीछे का कुछ याद मुझे 
इस पल ज़रा कुछ जी लून  ओर , है बस दिल से दरकार यही 

कुछ सुन लू और कुछ बोल सकूं , कुछ जी लूं  और कुछ मर जाऊं 
हर रोज़ यह सन्नाटे भी  अभ , कुछ ओर अपने से लगते है 

Monday, February 20, 2017






आज  मैं  हूँ  - कल  राख  - फिर धुँआ  हो  जाऊँगा 

हर  रोज़  हर  लम्हा  कुछ और  मरता जाऊँगा 

ज़िन्दग़ी  है  ज़िन्दग़ी  है  चार पल  की  सिर्फ इतनी 

तुम कहो  या  न कहो तुम  - मैं  तो  ढलता  जाऊँगा 

हाथ  से सुर्ख  रेत  जैसा  - मैं फिसलता  जाऊँगा 

आज  मैं  हूँ  - कल  राख  - फिर धुँआ  हो  जाऊँगा 

आज मैं हूँ - कल राख - फिर धुँआ हो जाऊँगा



आज  मैं  हूँ  - कल  राख  - फिर धुँआ  हो  जाऊँगा 



हर  रोज़  हर  लम्हा  कुछ और  मरता जाऊँगा 



ज़िन्दग़ी  है  ज़िन्दग़ी  है  चार पल  की  सिर्फ इतनी 



तुम कहो  या  न कहो तुम  - मैं  तो  ढलता  जाऊँगा 



हाथ  से सुर्ख  रेत  जैसा  - मैं फिसलता  जाऊँगा 



आज  मैं  हूँ  - कल  राख  - फिर धुँआ  हो  जाऊँगा